बनारस का दशाश्वमेध घाट ऐतिहासिक और धार्मिक, दोनो ही दृष्टिकोण से दिलचस्प व महत्वपूर्ण रहा है । इसके नामकरण के पीछे भी एक इतिहास है जिसमें एक से अधिक विचारधाराएँ हैं । एक विचारधारा के अनुसार ब्रम्हा ने इसे भगवान शिव के स्वागत में बनवाया था, वहीं दूसरी विचारधारा ये कहती है की ब्रम्हा ने दशाश्वमेध यजना के दौरान यहीं पर दस अश्वों की बली दी थी और इसलिए इस घाट का नाम दशाश्वमेध पड़ा । ख़ैर, काशीविश्वनाथ मंदिर से निकट स्थित इस घाट के वर्तमान रूप का निर्माण 1748 ईसवी में पेशवा बाला जी राव ने किया जिसे बाद में 1774 ईसवी में महारानी अहिल्याबाई होलकर ने पुनर्निर्मित किया ।

इस घाट का महत्व वर्तमान परिपेक्ष्य में ये है कि यहाँ रोज़ शाम "गंगा आरती" का प्रदर्शन होता है जिसमें गंगा नदी को प्रार्थना अर्पित की जाती जाती है । लगभग 45 मिनट तक चलने वाली यह विलक्षण प्रस्तुति निसंदेह एक मनमोहक और मनोरम दृश्य होता है । गंगोत्री सेवा समिति के प्रधान पुजारी के नेतृत्व में वेद और उपनिषद के कुछ छात्रों द्वारा इस अद्भुत अनुष्ठान का प्रदर्शन किया जाता है । एक समान पोशाक से सुसज्जित ये पुजारी, हाथों में दीप, भव्य पीतल का लैंप इत्यादि लिए आरती का प्रदर्शन करते हैं । उसी समय नेपथ्य से आती सांगीतिक मंत्रोच्चारण की ध्वनि, धूप-अगरबत्तियों की खुशबू और बीच बीच में शंखनाद की आवाज़ एक साथ वातावरण में घुलने से आनंद परमानंद में परिवर्तित हो जाता है।
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| आरती के दौरान प्रयोग किये जाने वाले पीतल लैंप की तस्वीर |
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| आरती के दौरान हो रहे शंखनाद की तस्वीर |
हर दिन हज़ारों के तादाद में आये हुए लोग इसके प्रत्यक्ष-द्रष्टा बनते हैं जिसमें लोगों का एक समूह नदी के किनारे बोट पर बैठ कर भी इस आरती का आनंद ले रहा होता है । इस विराट प्रदर्शन का साक्ष्य बनना वास्तव में एक आनंददायक अनुभव रहा ।
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| हज़ारों के तादाद में आये हुए लोग |
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| बोट पर बैठ कर आरती देख रहे लोग |
©Both the text and photographs are protected works of the author Bibhuti Bhushan Mishra. They can not be published, reproduced, adapted or otherwise dealt with without the prior permission of the author.
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