दिल्ली में बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। दिल्ली कितनी सहस्त्राब्दियों से प्यासी थी, इस बात का अंदाज़ा लगाना अब कठिन सिद्ध हो रहा था। प्रतीक्षा जितनी भी लंबी रही हो पर ये किसी उपलब्धि से कम नहीं कि दिल्ली की तृष्णा उसके जीवन काल में पूर्ण हो गई। ओम ये सब सोचकर मन ही मन आनंदित हो रहा था। उसे ये सोचने में एक प्रकार की संतुष्टि मिल रही थी। ओम दरअसल इतना भावुक व्यक्ति था कि किसी निर्जीव वस्तु या निष्प्राण शहर से भी उसकी भावनाएँ ठीक वैसे ही जुड़ जाती थी जैसे किसी इंसान से। आज वो बहुत दिनों बाद प्रसन्न दीख रहा था। सहसा उसके मन में ये विचार आया कि संसार में जाने कितने ऐसे लोग होंगे जिनकी तृष्णाएँ ताउम्र अधूरी ही रह जाती होगी। ईश्वर के इस दोयम नीति पर अब उसे क्रोध आने लगा। ओम का प्रसन्न मुख धीरे-धीरे उदासी से भर गया और वो एक टक बारिश को देखने लगा। ओम के अपने ख़्वाब तो ख़ैर बहुत पहले ही मर चुके थे पर दूसरों के सपने पूरे होते देख, आज भी उसे बेहद ख़ुशी मिलती थी। अपने ख़्वाबों से अब ओम को चिढ़ हो चली थी, वो ख़्वाब जो उसने कई वर्षों तक संजो के रखे थे। दरअसल ख़्वाब अब उसे आदर्शवाद की किताबों के वैसे सुनहरे अध्याय से लगने लगे थे जिनका यथार्थ से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। यथार्थवाद के सिद्धान्तों ने ओम का गला ऐसे दबोचा था कि दिन-ब-दिन उसके ख़्वाब देखने की चाहत जाती सी रही थी। ख़्वाबों के टूट कर बिखर जाने से कहीं बुरा होता है ख़्वाब देखने की चाहत का मर जाना और ओम के साथ ठीक ऐसा ही हुआ था।
बारिश को देखते तल्लीन ओम की अन्यमनस्कता तब टूटी जब यकायक बगल की बालकॉनी से गाने की तेज़ आवाज़ उसके कानों में पड़ी -
"किसी के हिस्से में प्यास आई
किसी के हिस्से में जाम आया
नसीब में जिसके जो लिखा था"
ओम ने देखा की बगल की बालकॉनी में अधेड़ उम्र की एक लड़की खड़ी है, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा है। उसकी बालकॉनी में कुर्सी पर एक रेडियो रखा हुआ था जिसकी आवाज़ उसने अचानक तेज़ कर दी थी। ऐसा लगा मानो उस लड़की ने ओम का मन पढ़ लिया हो। शीघ्र ही उसके मुख पर भी उदासी की लकीरें खीच गई। उस गाने ने ओम का मन इतना विचलित कर दिया कि वो बालकॉनी से उठकर अपने कमरे में चला गया और फिर उसे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।
आँखें खुली तो ओम ने देखा कि बारिश के साथ अब धूप भी खिल उठी है। कुछ ही देर की कड़ी धूप में सड़क इतना तप चुका था कि बारिश की बूंदें सड़क पर पड़ते ही लुप्त हो जा रही थी। ओम अब सोचने लगा कि मानव का अस्तित्व भी तो ऐसे ही क्षणभंगुर होता है और ताप बर्दाश्त करने की उसकी भी एक सीमा होती है। ओम अपने ह्रदय की ज्वालाओं की दाहकता के बारे में सोचकर व्यग्र हो उठा। व्याकुल ओम की नज़र अचानक खिड़की से बाहर गई जहाँ आकाश में एक अत्यंत ख़ूबसूरत इंद्रधनुष बन रहा था। वो इंद्रधनुष इतना खूबसूरत था कि एक क्षण में ओम का मन जीवन रूपी उत्साह से भर गया। ओम को प्रकृति की इस अद्भुत विशेषता पर विस्मय हुआ। उसने जल्दी से रेडियो खोला। विविध भारती पर गानों का कार्यक्रम मुसलसल जारी था -
महफ़िल में अब कौन है अजनबी,
इस बार रेडियो की आवाज़ ओम ने तेज़ की और वो जल्दी से बालकॉनी की तरफ भागा। वो लड़की ठीक उसी जगह मूर्तिवत खड़ी थी। गाने की आवाज़ सुनते ही वो सहसा मुस्कुरा उठी, ख़ुशी की एक हल्की फुहार उसके मन को गुदगुदा गया हो जैसे।उन्मादपूर्ण उस मुस्कान से आनंदित ओम के मुख पर भी स्वतः मुस्कान आ गई। ओम को ये देख कर बेहद हैरानी हुई कि दोनों मूलभूत मानवीय संवेदनाएं, उदासी और ख़ुशी, कितने संक्रामक होते हैं।
©All contents are protected works of the author Bibhuti Bhushan Mishra. They can not be published, reproduced, adapted or otherwise dealt with without the prior permission of the author.
Bahut sundar 'Laghukatha'. Wah
ReplyDeleteआपका धन्यवाद
Deleteबहुत ही खूबसूरत।
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया
Deleteबहुत ही वास्तविक
ReplyDeleteआपका बहुत धन्यवाद
ReplyDelete